Ganga Knowledge Centre
गंगा का बखान ईसा से साढ़े सात हजार साल पहले ऋग्वेद और दूसरे पुराणों में मिलता है। पौराणिक कथाएँ कहती हैं कि गंगा नदी भगवान ब्रह्मा के कमण्डल से निकलीं। राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की श्रापित होकर भटकती आत्माओं की शान्ति के लिए तप किया। वह चाहते थे कि ब्रह्माजी गंगा नदी को पृथ्वी पर भेजें ताकि उनके पूर्वजों का कल्याण हो। ब्रह्माजी खुश हुए। अब सवाल था कि गंगा इतनी ऊँचाई से प्रचण्ड वेग के साथ जब पृथ्वी पर आएँगी तो इस धारा का क्या होगा, तब भगवान शिव आगे आए और उन्होंने एक जटा को खोलकर इसके जरिए गंगा का पृथ्वी पर आने का रास्ता सुलभ किया। वैसे गंगा को लेकर न जाने कितनी ही पौराणिक कहानियाँ हैं।
करीब 2525 किलोमीटर की लम्बी यात्रा पर निकलने से पहले गंगा गंगोत्री में करीब तीन हजार फुट की ऊँचाई से गोमुख से निकलती हैं। सागर से मिलने से पहले धरती पर उनका आखिरी बिन्दु सुन्दरवन है। कहा जाता है कि दुनिया में शायद ही कोई ऐसी नदी हो, जो इतनी उत्पादक और पवित्र हो। भला कौन-सी नदी होगी, जिसने इर्द-गिर्द के इतने लम्बे क्षेत्र को उपजाऊ और उत्पादक बनाकर खुशहाली से भरा हो। नदी के करीब आते ही महसूस होने लगता है कि मानो किसी आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ रहे हों। गंगा का आश्रय और निकटता पाकर जितना धर्म-कर्म फला-फूला और साहित्य रचा गया, वो कहाँ और मुमकिन हो सकता था। आमतौर पर गंगा के किनारे जो शहर-गाँव बसे, उनकी तहजीब और दर्शन ने मानवता को समृद्ध किया।
तमाम विदेशी तीर्थयात्री गंगा पर मुग्ध दिखे। तमाम अँग्रेज़ विद्वानों ने गंगा पर किताबें और कविताएँ रच डालीं। हिन्दुओं के जीवन, मन-करम-वचन पर सदियों से गहरा असर डालने वाली रामचरित मानस की रचना भी तुलसीदास ने गंगा किनारे ही की। कुल मिलाकर गंगा की अथक यात्रा ने हमारे देश को एक चरित्र दिया, इसके कण-कण में मस्ती और भरपूर जीवन का आलम भरा। आम हिन्दू मानता है कि गंगा में एक बार नहाए बगैर उनका जीवन अधूरा है। गंगा का पानी घर में रखना पवित्र माना जाता है। पूजा-अनुष्ठान बगैर इसके नहीं होते।
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