Tuesday, July 30, 2019

श्री गंगा मां की आरती - ॐ जय गंगे माता



ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता।
ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
चंद्र सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता।
शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता।
ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता।
कृपा दृष्टि हो तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता।
ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
एक बार जो प्राणी, शरण तेरी आता।
यम की त्रास मिटाकर, परमगति पाता।
ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
आरति मातु तुम्हारी, जो नर नित गाता।
सेवक वही सहज में, मुक्ति को पाता।
ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।

GANGA STOTRAM – HINDI, रचन: आदि शंकराचार्य

रचन: आदि शंकराचार्य
देवि! सुरेश्वरि! भगवति! गंगे त्रिभुवनतारिणि तरलतरंगे ।
शंकरमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले ॥ १ ॥
भागीरथिसुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमे ख्यातः ।
नाहं जाने तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥ २ ॥
हरिपदपाद्यतरंगिणि गंगे हिमविधुमुक्ताधवलतरंगे ।
दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥ ३ ॥
तव जलममलं येन निपीतं परमपदं खलु तेन गृहीतम् ।
मातर्गंगे त्वयि यो भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥ ४ ॥
पतितोद्धारिणि जाह्नवि गंगे खंडित गिरिवरमंडित भंगे ।
भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये पतितनिवारिणि त्रिभुवन धन्ये ॥ ५ ॥
कल्पलतामिव फलदां लोके प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके ।
पारावारविहारिणि गंगे विमुखयुवति कृततरलापांगे ॥ ६ ॥
तव चेन्मातः स्रोतः स्नातः पुनरपि जठरे सोपि न जातः ।
नरकनिवारिणि जाह्नवि गंगे कलुषविनाशिनि महिमोत्तुंगे ॥ ७ ॥
पुनरसदंगे पुण्यतरंगे जय जय जाह्नवि करुणापांगे ।
इंद्रमुकुटमणिराजितचरणे सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ॥ ८ ॥
रोगं शोकं तापं पापं हर मे भगवति कुमतिकलापम् ।
त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे ॥ ९ ॥
अलकानंदे परमानंदे कुरु करुणामयि कातरवंद्ये ।
तव तटनिकटे यस्य निवासः खलु वैकुंठे तस्य निवासः ॥ १० ॥
वरमिह नीरे कमठो मीनः किं वा तीरे शरटः क्षीणः ।
अथवाश्वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीनः ॥ ११ ॥
भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये ।
गंगास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरो यः स जयति सत्यम् ॥ १२ ॥
येषां हृदये गंगा भक्तिस्तेषां भवति सदा सुखमुक्तिः ।
मधुराकंता पंझटिकाभिः परमानंदकलितललिताभिः ॥ १३ ॥
गंगास्तोत्रमिदं भवसारं वांछितफलदं विमलं सारम् ।
शंकरसेवक शंकर रचितं पठति सुखीः तव इति च समाप्तः ॥ १४ ॥

राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन परियोजना, विश्व बैंक की सहायता

राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन परियोजना

14 जून, 2011

गंगा भारत की अत्यंत महत्त्वपूर्ण नदी है। इसके विशाल बेसिन में देश के एक-चौथाई जल-संसाधन मौजूद हैं और 40 करोड़ से अधिक लोग – भारत की लगभग एक-तिहाई आबादी - इसके क्षेत्र में निवास करते हैं। हिमालय क्षेत्र में स्थित अपने हिमानी-स्रोत से बंगाल की खाड़ी में एक विशाल पंखे जैसे आकार के डेल्टा तक 2,500 किमी. की यात्रा के दौरान गंगा की मुख्यधारा भारत के पांच राज्यों से होकर गुजरती है और अपने हरे-भरे मैदानी इलाकों को उपजाऊ बनाने के साथ-साथ किनारों पर बसे कस्बों व शहरों में जीवन का संचार करती है।
भारत की पवित्रतम नदी होने के नाते गंगा का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व है, जो इसके बेसिन की सीमाओं से परे तक फैला हुआ है। इसकी देवी के रूप में पूजा-अर्चना की जाती है और प्राचीन काल से ही देश-भर के लोग इसके किनारों पर स्थित अनेक ऐतिहासिक नगरों में बने मंदिरों में पूजा करने और इसके जल में स्नान करने के लिए आते हैं।
अपनी इस मूर्तिवत् स्थिति और धार्मिक धरोहर के बावजूद आज गंगा को प्रदूषण-संबंधी भारी दबावों का सामना करना पड़ रहा है और इसकी जैव-विविधता तथा पर्यावरण-संबंधी व्यावहारिकता (सस्टेनबिलिटी) को इनसे पैदा होने वाले ख़तरों का सामना करना पड़ रहा है। लगातार बढ़ती हुई आबादी, अनियोजित शहरीकरण और उद्योगीकरण की वजह से नदी के जल की गुणवत्ता पर असर पड़ा है। आज गंगा के जल में सीवेज के साथ-साथ सॉलिड वेस्ट और औद्योगिक वेस्ट की भरमार है, जो इसके किनारे रहने वाले लोगों तथा यहां होने वाली आर्थिक गतिविधियों की देन है।
प्रदूषण-संबंधी इन भारी दबावों से निपटने के लिए ज़रूरी अवसंरचना की कमी का अर्थ है कि नदी की मुख्यधारा के समीप बसे कस्बों और शहरों में एकत्र होने वाले सीवेज के मात्र एक-तिहाई का ही उपचार हो पाता है और इसका अनुपचारित या अच्छी तरह ट्रीट नहीं किया गया औद्योगिक वेस्टवाटर (कारखानों से बाहर निकलने वाला बहिःस्राव या दूषित जल और कचरा) नदी में मिलने वाले समस्त वेस्टवाटर का 20 प्रतिशत है। वास्तव में गंगा, विशेष रूप से इसके मध्य क्षेत्र में इतना अधिक प्रदूषण है कि इसका जल पीने लायक ही नहीं, बल्कि नहाने लायक भी नहीं है।
भारत सरकार गंगा एक्शन योजना के जरिए पहले भी गंगा में बढ़ते हुए प्रदूषण से निपटने की कोशिश कर चुकी है। जबकि इस कार्यक्रम से नदी की सफ़ाई करने में सीमित सफलता ही मिल पाई, इस कार्यक्रम को क्रियान्वयन के दौरान अनेक खामियों का सामना करना पड़ा।
पिछले अनुभवों से मिली शिक्षा के आधार पर भारत सरकार ने गंगा की सफ़ाई करने और इसके संरक्षण के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण का विकास किया है, जिसकी शुरूआत वर्ष 2009 में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण नेशनल गंगा रिवर बेसिन ऑथोरिटी (एनजीआरबीए) की स्थापना के साथ हुई। एनजीआरबीए को यह सुनिश्चित करने के लिए एक बहु-क्षेत्रीय कार्यक्रम तैयार करने का काम सौंपा गया है कि वर्ष 2020 के बाद नगरपालिका या उद्योगों का अनुपचारित अपशिष्ट जल (वेस्टवाटर गंगा) में नहीं बहने दिया जाएगा।
विश्व बैंक की सहायता
विश्व बैंक उक्त राष्ट्रीय लक्ष्य अर्जित करने के भारत सरकार के प्रयासों में सहायता कर रहा है। दिसम्बर 2009 में पर्यावरण और वन मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जयराम रमेश और विश्व बैंक के अध्यक्ष रॉबर्ट ज़ोएलिक के बीच हुई एक बैठक में इस बात पर सहमति व्यक्त की गई कि बैंक एनजीआरबीए कार्यक्रम को दीर्घकालिक सहायता मुहैया कराएगा, जिसमें इस कार्यक्रम को क्रियान्वित करने के लिए ज़रूरी संस्थाओं का विकास और सुदृढ़ीकरण करना तथा अवसंरचना-संबंधी प्राथमिक निवेशों के लिए वित्त सुलभ कराना शामिल है।
बैंक के कार्यकारी निदेशक मंडल ने 31 मई, 2011 को 1.556 अरब डॉलर की लागत वाली राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन परियोजना को स्वीकृति प्रदान की, जिसके लिए विश्व बैंक समूह से 1 अरब डॉलर की धनराशि प्राप्त होगी (जिसमें आईडीए से 19.9 करोड़ डॉलर का ब्याजमुक्त ऋण (क्रेडिट) और आईबीआरडी से 80.1 करोड़ डॉलर का कम ब्याज पर ऋण (लोन) शामिल है)। इस परियोजना को आठ वर्षों में पूरा किया जाएगा। यह परियोजना निम्न क्षेत्रों में राष्ट्रीय गंगा नदी नदी बेसिन प्राधिकरण (एनजीआरबीए) की मदद करेगी।
इसकी परिचालन-स्तर पर स्थापित संस्थाओं की क्षमता का गठन करना, जिससे ये गंगा की सफ़ाई और इसका संरक्षण करने के दीर्घकालिक कार्यक्रम का प्रबंध कर सकें।
  • केन्द्रीय और राज्य-स्तर पर परिचालन-स्तरीय संस्थाओं के गठन के अलावा परियोजना अत्याधुनिक गंगा नॉलेज सेंटर स्थापित करने में भी एनजीआरबीए की मदद करेगी, जो गंगा के संरक्षण के लिए प्रासंगिक जानकारी के भंडार के तौर पर काम करेगा।
  • जबकि एनजीआरबीए गंगा में प्रदूषण कम करने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, सीवर नेटवर्क आदि की व्यवस्था पर व्यय करने के लिए पूंजी सुलभ कराएगा, नगरों और नगरपालिकाओं को आगे चलकर इनके प्रबंध और रखरखाव (ओ. एंड एम.) की ज़िम्मेदारी निभानी होगी। परियोजना से उक्त प्रणालियों (असेट्स) के सुचारू संचालन के लिए ज़िम्मेदार नगर-स्तर पर सेवाएं मुहैया कराने वालों की क्षमता का गठन और ऐसा करने के लिए उनकी प्रणालियों का आधुनिकीकरण करना होगा।
  • परियोजना से केन्द्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड्स को सुदृढ़ करने में मदद मिलेगी, ताकि ये अपनी सूचनी प्रणालियों के आधुनिकीकरण की मदद से और स्टॉफ़ को प्रशिक्षण मुहैया कराकर गंगा में प्रदूषण की बेहतर ढंग से मॉनिटरिंग कर सकें। इस परियोजना द्वारा गंगा जल की गुणवत्ता की मॉनिटरिंग प्रणाली को उन्नत करने के लिए वित्त सुलभ कराने के साथ-साथ गंगा जल की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले प्रदूषण के सभी स्रोतों की सूची तैयार की जाएगी।
  • जनता की भागीदारी की कमी गंगा को स्वच्छ करने के लिए पूर्व में किए गए प्रयासों के सफल न होने का एक कारण थी। नदी के किनारे रहने वाले समुदायों, तीर्थयात्रियों तथा नदी के जल-संग्रहण क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) में स्थित उद्योगों समेत विभिन्न पक्षकारों (स्टेकहोल्डर्स) ने नदी को प्रदूषित करने वाले रोज़मर्रा के व्यवहार में बदलाव लाने की ज़रूरत को नहीं समझा। इस परियोजना से एनजीआरबीए को जनता को स्वच्छता कार्यक्रम में भाग लेने के लिए उत्साहित करने के लिए उनसे संपर्क साधने वाले कार्यक्रमों (कम्यूनिकेशंस प्रोग्रैम) की तैयारी और इन्हें क्रियान्वित करने में मदद मिलेगी।
गंगा में प्राथमिकता-प्राप्त स्थानों पर प्रदूषण के स्रोत (प्वाइंट सोर्स) कम करने के लिए कुछ प्रदर्शनात्मक निवेश (डिमांस्ट्रेटिव इन्वेस्टमेंट) करने होंगे। यह परियोजना नई प्रायोगिक (पायलट) प्रौद्योगिकियों या क्रियान्वयन व्यवस्थाओं के गठन के लिए वित्त मुहैया कराएगी, जिनके सफल होने की स्थिति में इनका विस्तार किया जा सकेगा। इस तरह के निवेशों का चयन एनजीआरबीए के लिए विकसित निवेश के फ़्रेमवर्क कार्यक्रम के अनुसार किया जाएगा।

एक नदी के ‘इंसान’ होने के मायने

एक नदी के ‘इंसान’ होने के मायने

Submitted by UrbanWater on Sun, 03/26/2017 - 10:28

यमुना नदीयमुना नदीविश्व जल दिवस 2017 से दो दिन पूर्व उत्तराखण्ड हाईकोर्ट का नदियों के सम्बन्ध में आया फैसला काफी महत्त्वपूर्ण है। हाईकोर्ट ने अपने इस फैसले में गंगा, यमुना तथा उसकी सहायक नदियों को जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया है। न्यायालय का ऐसा करने का अर्थ बिलकुल स्पष्ट है, वह नदियों को जीवित के समान अधिकार देकर लोगों से इन नदियों के प्रति मनुष्यों के समान व्यवहार करने की अपेक्षा रखती है।

आधुनिक पूँजीवादी युग ने नदी, पानी, तथा अनाज जैसी दैनिक उपभोग की वस्तुओं पर अपना नियंत्रण कर लिया है। ये वर्ग अपने निजी लाभ के लिये बड़े पैमाने पर प्रकृति को नुकसान पहुँचा रहे हैं। पहाड़ से लेकर रेगिस्तान तक का प्राकृतिक असन्तुलन बिगाड़ने में पूँजीवादी वर्ग जिम्मेदार हैं। नदियों में बढ़ता प्रदूषण का स्तर, जंगलों का विनाश, पहाड़ों पर तोड़-फोड़ इनमें प्रमुख हैं। इस वजह से इन प्राकृतिक बनावटों का स्वरूप पिछले कुछ वर्षों से बिलकुल बिगड़ गया है। अगर आप आज किसी बड़ी नदी को देखें तो यह नदी की तरह नहीं दिखती। इसमें बहता काले रंग का बदबूदार पानी इसे एक नाले की संज्ञा देने को मजबूर करता है। इन नदियों में गंगा तथा यमुना प्रमुख हैं।

कई बार गंगा, यमुना नदी को नाला कहकर न्यायालयों ने भी इस पर टिप्पणी की है। इनमें बढ़ते प्रदूषण के स्तर के लिये राज्य तथा केन्द्र सरकार को कई बार नोटिस भी जारी किया जा चुका है। इसके बावजूद आज इन नदियों की हालत जस-की-तस बनी हुई है।

हालांकि नदियों में बढ़ते प्रदूषण की वजह से मानव जाति को होने वाले नुकसान का आकलन करें तो इससे समाज का सबसे कमजोर तबका अधिक प्रभावित है। इनकी जीविका बनाए रखने में नदियों का बड़ा योगदान रहा है। ये वे कमजोर लोग हैं जिन्हें समाज ने हमेशा हाशिए पर रखा। इनके विरोध की अपनी कोई ताकतवर आवाज नहीं है। ध्यानपूर्वक देखें तो आज नदियों का हाल भी इसी कमजोर वर्ग के समान हो गया है। ये भी खुद पर हो रहे अत्याचार को चुपचाप सहन कर रही हैं। लेकिन हाल के उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के नदियों को इंसानी अधिकार का दर्जा दिये जाने से एक उम्मीद जगी है। नदियाँ इस कानूनी अधिकार के संरक्षण में अपनी आवाज उठा सकेंगी।

नदी, पारिस्थितिकी तथा लोकतंत्र


एक स्वस्थ लोकतांत्रिक माहौल में व्यक्ति अपने मूलभूत अधिकारों की माँग बेहतर तरीके से कर सकता है। इसमें चाहे अन्न का अधिकार हो, स्वास्थ का अधिकार, शिक्षा का या फिर जल का अधिकार हो, वह इसे पाने के लिये शासन पर दबाव बनाता है। यही माँग, आपूर्ति तथा नागरिकों की सुरक्षा लोकतंत्र को मजबूत बनाती है। ठीक यही बातें प्रकृति के मामले में भी है। प्रकृति की अपनी एक पारिस्थितिकी पहचान है। नदी, वन, पहाड़ तथा झील सभी की अपनी एक स्वतंत्र पहचान है। इसका सन्तुलन बनाए रखना होगा। परन्तु आज ठीक विपरीत हो रहा है। उदाहरण के तौर पर देखें तो नदियों पर बाँध बनाना, उसे दूषित करना तथा नदी के किनारों का अतिक्रमण करना इसके सन्तुलन के लिये सबसे बड़ा खतरा है। गौरतलब है कि हिन्दू पौराणिक ग्रंथों में गंगा तथा यमुना नदी को मनुष्य के पापों का नाश करने वाली बताया गया है। इस वजह से ये नदियाँ पूजनीय मानी जाती हैं। इसके बावजूद आज गंगा, यमुना समेत भारत की कई नदियाँ अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिये संघर्ष कर रही हैं। कई सामाजिक संगठन तथा पर्यावरणविद नदियों को इस संकट से उबारने के लिये आगे आये हैं। तथा इस दिशा में कुछ अच्छे प्रयास भी किये। परन्तु कारखानों तथा शहरों से निकलने वाले दूषित रासायनिक पानी को इन नदियों में लगातार प्रवाहित किये जाने की वजह से इनका प्रदूषण स्तर बढ़ जाता है। 1252 किमी. लम्बी यमुना नदी का महज 2 प्रतिशत हिस्सा ही दिल्ली शहर से होकर जाता है किन्तु यहाँ यह नदी 80 प्रतिशत प्रदूषित होती है।

नदियों को कानून की ओर से जीवित व्यक्ति का दर्जा दिये जाने से ये भी एक लोकतांत्रिक देश में अपने अधिकारों की माँग कर सकेंगी।

न्यूजीलैंड की वांगानुई नदी भी है ‘जीवित व्यक्ति’


न्यूजीलैंड की वांगानुई नदी को वहाँ की संसद ने जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया है। वहाँ के स्थानीय माओरी जनजातियों की आस्था का प्रतीक मानते हुए ऐसा किया गया है। जनजाति समुदाय के लोग नदी तथा पहाड़ों को देवता मानकर इनकी पूजा करते हैं। वांगानुई नदी को यह अधिकार दिलाने के लिये इन्हें 147 वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा था। अगर कोई व्यक्ति इस नदी को दूषित अथवा इसके किनारों का अतिक्रमण करता है तो उस पर मुकदमा चलाया जाएगा।

भारत में पर्यावरण सुरक्षा के संवैधानिक अधिकार


भारतीय संविधान के अन्तर्गत पर्यावरण सुरक्षा तथा संवर्धन के सम्बन्ध में कोई सीधा प्रावधान नहीं है। हालांकि सत्तर के दशक में स्टाॅकहोम सम्मेलन में पर्यावरण सुरक्षा के सम्बन्ध में हुई चर्चा के बाद भारत ने 1976 में 42वें संविधान संशोधन के अन्तर्गत पर्यावरण सुरक्षा तथा संवर्धन को अनुच्छेद 48(क) में जोड़ दिया। यह नीति निदेशक तत्व के अन्तर्गत राज्य का विषय है।

संविधान के अनुच्छेद 49(क) के अनुसार राज्य पर्यावरण, वन तथा वन्य जीवों की सुरक्षा के लिये प्रयास करें।

इसी तरह अनुच्छेद 51(क)(छ) नागरिकों के मूल कर्तव्य में भी पर्यावरण सुरक्षा की बात की गई है। इसमें देश के समस्त नागरिकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे प्रकृति की सुरक्षा में अपना सहयोग दें। जिसमें नदियों, पहाड़ों, झीलों तथा वनों को शामिल किया गया है।

संविधान द्वारा प्रकृति की सुरक्षा तथा संवर्धन की दृष्टि में ये अधिकार महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। परन्तु पिछले कुछ दशकों से देश में प्राकृतिक संसाधनों तथा वनों का जिस तरह अन्धाधुन्ध दोहन और विनाश हुआ है उसे देखते हुए इस दिशा में और प्रयास किये जाने की जरूरत महसूस होती है।

नदी के लिये जीवित व्यक्ति का दर्जा है खास


उत्तराखण्ड हाईकोर्ट द्वारा गंगा, यमुना तथा उसकी सहायक नदियों को जीवित व्यक्ति का दर्जा ‘पैरेंट पीट्रीआई लीगल एक्ट’ को आधार बनाकर दिया गया है। इसके अन्तर्गत गंगा तथा यमुना नदियों की देखरेख से जुड़े अधिकारियों तथा विभागों को इन नदियों का अभिभावक घोषित किया गया है। अर्थात ठीक उसी तरह जैसे किसी बच्चे की परवरिश तथा उसकी देखरेख में एक अभिभावक की अहम भूमिका होती है। वैसे ही अब सरकारी विभागों से जुड़े अधिकारी इन नदियों की दशा के लिये जिम्मेदार माने जाएँगे। इन अधिकारियों में नमामि गंगे परियोजना के निदेशक, उत्तराखण्ड के मुख्य सचिव तथा महाधिवक्ता को शामिल किया गया गया है।

हालांकि हाल में नदियों को मिले इस अधिकार पर कानून विशेषज्ञों ने विस्तृत अध्ययन की बात की है। कुछ मान रहे हैं कि यह अब गंगा, यमुना तथा सहायक नदियों में फेंके गए कचरे को यह माना जाएगा कि किसी जीवित पर फेंका गया है। इन नदियों को बीमार करने तथा मारने की कोशिश को किसी जीवित व्यक्ति को बीमार करने और मारने की कोशिश मानकर मुकदमा दर्ज किया जा सकेगा।

देश में नदियों को स्वच्छ बनाने के लिये कई सरकारी नीतियाँ तथा योजनाएँ लागू की गई हैं। इसके बावजूद इन नदियों की हालत सुधरने की बजाय और बिगड़ती जा रही हैं।

देश की प्रमुख नदियों में प्रदूषण रोकने तथा इसे स्वच्छ बनाए रखने के लिये सरकारी तथा न्यायालयीय निर्णय जितने महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं, उतना ही महत्त्वपूर्ण लोगों का इन नदियों की स्वच्छता के लिये जागरूक होना भी है।

गंगा का बखान ईसा से साढ़े सात हजार साल पहले ऋग्वेद और दूसरे पुराणों में मिलता है


Ganga Knowledge Centre


गंगा का बखान ईसा से साढ़े सात हजार साल पहले ऋग्वेद और दूसरे पुराणों में मिलता है। पौराणिक कथाएँ कहती हैं कि गंगा नदी भगवान ब्रह्मा के कमण्डल से निकलीं। राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की श्रापित होकर भटकती आत्माओं की शान्ति के लिए तप किया। वह चाहते थे कि ब्रह्माजी गंगा नदी को पृथ्वी पर भेजें ताकि उनके पूर्वजों का कल्याण हो। ब्रह्माजी खुश हुए। अब सवाल था कि गंगा इतनी ऊँचाई से प्रचण्ड वेग के साथ जब पृथ्वी पर आएँगी तो इस धारा का क्या होगा, तब भगवान शिव आगे आए और उन्होंने एक जटा को खोलकर इसके जरिए गंगा का पृथ्वी पर आने का रास्ता सुलभ किया। वैसे गंगा को लेकर न जाने कितनी ही पौराणिक कहानियाँ हैं।

करीब 2525 किलोमीटर की लम्बी यात्रा पर निकलने से पहले गंगा गंगोत्री में करीब तीन हजार फुट की ऊँचाई से गोमुख से निकलती हैं। सागर से मिलने से पहले धरती पर उनका आखिरी बिन्दु सुन्दरवन है। कहा जाता है कि दुनिया में शायद ही कोई ऐसी नदी हो, जो इतनी उत्पादक और पवित्र हो। भला कौन-सी नदी होगी, जिसने इर्द-गिर्द के इतने लम्बे क्षेत्र को उपजाऊ और उत्पादक बनाकर खुशहाली से भरा हो। नदी के करीब आते ही महसूस होने लगता है कि मानो किसी आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ रहे हों। गंगा का आश्रय और निकटता पाकर जितना धर्म-कर्म फला-फूला और साहित्य रचा गया, वो कहाँ और मुमकिन हो सकता था। आमतौर पर गंगा के किनारे जो शहर-गाँव बसे, उनकी तहजीब और दर्शन ने मानवता को समृद्ध किया।

तमाम विदेशी तीर्थयात्री गंगा पर मुग्ध दिखे। तमाम अँग्रेज़ विद्वानों ने गंगा पर किताबें और कविताएँ रच डालीं। हिन्दुओं के जीवन, मन-करम-वचन पर सदियों से गहरा असर डालने वाली रामचरित मानस की रचना भी तुलसीदास ने गंगा किनारे ही की। कुल मिलाकर गंगा की अथक यात्रा ने हमारे देश को एक चरित्र दिया, इसके कण-कण में मस्ती और भरपूर जीवन का आलम भरा। आम हिन्दू मानता है कि गंगा में एक बार नहाए बगैर उनका जीवन अधूरा है। गंगा का पानी घर में रखना पवित्र माना जाता है। पूजा-अनुष्ठान बगैर इसके नहीं होते।

गंगाजीकी आध्यात्मिक एवं भौतिक विशेषताएं

गंगाजीकी आध्यात्मिक एवं भौतिक विशेषताएं पापविनाशिनी ‘ गंगाजी ‘दशहरा’ हैं । वे शारीरिक , वाचिक एवं मानसिक पापोंसे युक्त निम्न दस पापोंका ...