Thursday, July 17, 2025

गंगाजीकी आध्यात्मिक एवं भौतिक विशेषताएं

गंगाजीकी आध्यात्मिक एवं भौतिक विशेषताएं

पापविनाशिनी

गंगाजी ‘दशहरा’ हैं । वे शारीरिक, वाचिक एवं मानसिक पापोंसे युक्त निम्न दस पापोंका हरण करती हैं ।

वाचिक पाप : १. चोरी, २. हिंसा एवं ३. परस्त्रीगमन

शारीरिक पाप : कठोर वचन, झूठ (असत्य) बोलना, चुगली अथवा निंदा करना तथा असंबद्ध, अकारण बडबडाना (वृथावल्गना)

मानसिक पाप : परापहार (दूसरोंका धन हडपनेका विचार मनमें आना), अनिष्टिंचतन (मनसे दूसरोंका अनिष्ट चिंतन करना) एवं दुराग्रह (झूठा अभिनिवेश होना)’ – गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी (‘गंगा पापविनाशिनी है, इसलिए चाहे जितने पाप कर एक गंगास्नानसे निपटा लो’, ऐसा नहीं होता, अपितु पापके विषयमें मनमें तीव्र खेद प्रतीत होना, तथा ‘वैसा पाप पुनः हमसे नहीं होगा’, इस विषयमें सतर्कता रखनेकी गंभीरता उत्पन्न होना आवश्यक है । – संकलनकर्ता)

गंगाजीके कुछ अन्य नाम

 अ. ब्रह्मद्रवा : ब्रह्मदेवने गंगाजीको अपने कमंडलुमें धारण किया इसलिए उन्हें ‘ब्रह्मद्रवा’ कहते हैं ।

आ. विष्णुपदी अथवा विष्णुप्रिया : गंगाजीके विष्णुपदको स्पर्श कर भूलोकमें अवतरित होनेसे उन्हें ‘विष्णुपदी’ अथवा ‘विष्णुप्रिया’ नाम प्राप्त हुए ।

इ. भागीरथी : राजा भगीरथकी तपस्याके कारण गंगा नदी पृथ्वीवर अवतीर्ण हुईं; इसलिए उन्हें ‘भागीरथी (भगीरथकी कन्या)’ कहते हैं ।

 ई. जाह्नवी : ‘हिमालयसे नीचे उतरते समय गंगाजी अपने साथ राजर्षि एवं तपस्वी जह्नुऋषिकी यज्ञभूमि बहा ले गईं । इस बातसे क्रोधित होकर जह्नुऋषिने उनके संपूर्ण प्रवाहका प्राशन कर लिया । तत्पश्चात जब भगीरथने जह्नुऋषिसे प्रार्थना की, तब उन्होंने गंगाजीके प्रवाहको अपने एक कानसे बाहर छोडा । इससे वे ‘जाह्नवी (जह्नुऋषिकी कन्या)’ कहलाने लगीं ।’ (वायुपुराण, अध्याय ९१, श्लोक ५४ से ५८)

उ. त्रिपथगा : ‘भूतलपर अवतरित होनेके पश्चात गंगाजीकी धाराको शिवजीने अपनी जटामें थाम लिया । उस समय उनके तीन प्रवाह हुए । इन प्रवाहोंमेंसे पहला स्वर्गमें गया, दूसरा भूतलपर रह गया तथा तीसरा पातालमें बह गया; इसलिए उन्हें ‘त्रिपथगा’ अथवा ‘त्रिपथगामिनी’ कहते हैं ।’

ऊ. गंगाजीके त्रिलोकमें नाम : गंगाजीको स्वर्गमें ‘मंदाकिनी’, पृथ्वीपर ‘भागीरथी’ तथा पातालमें ‘भोगावती’ कहते हैं ।

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